जो कहूँगा सच कहूँगा .

हमें अपने जीवन में सच का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए अर्थात ईमानदार होना चाहिए .हमें सभी कामों को ईमानदारी पूर्वक करना चाहिए .चाहे वह किसी प्रतियोगी परीक्षा कि तैयारी हो या फिर कोई अन्य काम की. ईमानदारी से किया गया हर काम पूर्ण होता हैं .इसमें गजब कि संतुष्टि होती हैं. लोग कहते हैं कि दुनिया से ईमानदारी ख़त्म हो गई हैं उस ईमानदारी का स्थान बेईमानी ने ले ली हैं लेकिन मैं कहता हूँ कि उस बेईमानी में भी ईमानदारी छुपी रहती हैं . सच्चाई की हमेशा जीत होती हैं . कहा गया हैं - सच परेशान हो सकता हैं मगर पराजित नहीं . मेरे विचार में, जय जवान जय किसान जय विज्ञान जय सच्चा(ईमानदार) इन्सान

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AMIT KUMAR GUPTA HAJIPUR VAISHALI BIHAR


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संसद के 60 वर्ष

Posted On: 4 Jun, 2012  
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में

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क्या हैं प्रेम ?(प्रेम दिवस विशेषांक )

Posted On: 12 Feb, 2012  
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मस्ती मालगाड़ी में

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हमारा समाज (लेखक-अमित कुमार गुप्ता )

Posted On: 13 May, 2011  
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Others मेट्रो लाइफ में

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BHARAT KE VIKASH ME PANCHAYATON KI BHUMIKA

Posted On: 1 Apr, 2010  
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Others न्यूज़ बर्थ में

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क्या हम कुवारे रह जायेंगे ?

Posted On: 24 May, 2010  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के द्वारा: amitkrgupta amitkrgupta

अमित जी नमश्कार . आरक्षण कभी भी समाधान नहीं होता यह केवल समाधान का एक माध्यम है .. महिलाओ की स्थिति न तो आरक्षण से सुधरेगी . न कोई परिवर्तन होगा हा .. राजनीती करने वालो की स्थिति में जरुर सुधार होगा . इस विस्तृत लेख में आपने सारी बाते साफ साफ कह ही दी है .... विषय बहुत बढ़िया उठाया है आपने इसपर व्यापक बहस होनी चाहिए आरक्षण तब बुरा लगता है जब सक्षम लोग इसका लाभ उठाते है .. आरक्षण से अगर पिछड़ी गरीब शोषित महिलाओं को मदद मिले तो कोई समस्या ही नहीं होगी पर ये आरक्षण का लाभ सब के सब सबल लोग उठ आले जायेंगे .. और यही होता आया है.. इस लिए जमीं पर उतर कर कार्य करने की जरुरत है . बढ़िया लेख अमित जी एक अनुभव साझा करने की इच्छा से ये लिंक दे रहा हु यदि समय मिले अपने विचार दे .......http://nikhilpandey.jagranjunction.com/2011/03/05/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%97-%E0%A4%9C%E0%A5%8B-%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%A6%E0%A5%87/

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

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प्रिय श्री अमित कुमार गुप्ता जी, आपनें मेरी बात मान कर अपनें ब्लॉग को एक नाम दे दिया हैं। देखकर बहुत अच्छा लगा। अब एक कार्य और करिए ताकि आपकी ताजा पोस्ट हमारी नजरों के सामनें रहें। वह यह कि BHARAT KE VIKASH ME PANCHAYATON KI BHUMIKA Posted On: Apr 01 ,2010 क्या हम कुवारे रह जायेंगे ? Posted On: May 24 ,2010 आधी आबादी को आरक्षण Posted On: May 26 ,2010 आपके उपर्युक्त तीनों लेख जब भी आपका ब्लॉग खोला जाएं तो सबसे ऊपर नजर आते हैं जबकि आपकी नई पोस्ट नीचे छूप जाती है। कृपया dashboard में एडिट में जाकर प्रत्येक पोस्ट के शीर्षक के नीचे एडिट करने के लिए क्लिक करें। फिर दायीं तरफ पब्लिश के नीचे स्टेटस में देखें कि क्या वहां sticky के आगे टिक किया हुआ है तो उसे पून: क्लिक कर हटा दें। व अपडेट पोस्ट का बटन दबा दें। इससे ये पोस्ट अपने सही स्थान पर पहूँच जाएंगी व आपकी नवीनतम पोस्ट ही सबसे ऊपर नजर आएंगी। ऐसा एक एक कर तीनों पोस्ट के साथ करना होगा । वेलेंटाइन कांटेस्ट के लिए लिखी आपकी रचनाएं भी रचनाएं तैयार करने में आपकी मेहनत को दर्शाती हैं। अच्छी रचनाएं हैं बधाई। अरविन्दइ पारीक

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सही कहा आपने की प्रेम के बिना जीवन असंभव हैं .प्रेम विवाहों की असफलता का सबसे बड़ा उदाहरण देहरादून मे राजेश गुलाटी द्वारा अपनी प्रेमिका (पत्नी) के 70 टुकड़े कर के उसको खत्म करने की घटना से मिल जाता है...... ये नहीं है की ऐसा सिर्फ प्रेम विवाहों मे ही होता है.... पर इस कथन से “प्यार भी कभी किसी का पूरा होता हैं प्यार का तो पहला अक्षर ही अधुरा होता हैं. भले ही किसी ने भी कहा हो मैं पूरी तरह से असहमत हूँ.... प्यार तो जानवर को भी अपना बना लेता है...मेरा मानना है की जीवन मे प्रेम ही एक ऐसा धन हैं जो सभी के पास कमाने का समान अवसर है......... इसको बाटो ये खुद ही कई गुना होकर मिलने लगेगा........... अच्छे लेख के लिए बधाई........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

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अमित जी ........... बेहतरीन लेख......... के लिए बधाई....... वास्तव मे हम लोग एक अजीब सी स्थिति से गुजर रहे हैं.......... यहाँ पाकिस्तान ओर हिंदुस्तान के बटवारे के लिए जिम्मेदार लोगों को कोसा जाता है...... पर जैसे ही अलग राज्य की बात आती है। तो नेतागण छोटे छोटे राज्यों को विकास के लिए आवश्यक बता देते हैं............... जब छोटे छोटे राज्य विकास के लिए सहायक हो सकते हैं तो दो अलग अलग राष्ट्र क्यों नहीं.......... जब भाषा के आधार पर राज्य बन सकते हैं तो धर्म के आधार पर देश क्यों नहीं....... वास्तव मे ये अलग अलग राज्य अपनी राजनीतिक खामियों को छुपने का प्रयास है........ अपने लिए नए राजनैतिक अवसर पैदा करने का प्रयास है.......... भले ही आज लोग कितने ही तर्क दे दें किन्तु संयुक्त परिवार आज भी एकल परिवारों से श्रेष्ठ है.......... बाटने से चीज़ें हो या रिश्ते ओर भावनाए कमजोर ही होते हैं............. एक उललेखनीय लेख के लिए बधाई...........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

अमित जी आपने अपने लेख में भारतीय राजनीति की विद्रूपताओं के प्रत्येक आयाम को छूने का बेहतरीन प्रयास किया है … बधाई । वैसे भौतिकवाद की विषबेल का ठीकरा विकास के माथे फ़ोड़ना उचित नहीं है । दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं । विकास जहां एक निरन्तर और आवश्यक प्रक्रिया है, वहीं भौतिकवाद आयातित संस्कृतियों की कुंठाग्रस्त अभिव्यक्ति । रिश्वत और भ्रष्टाचार का कालाधन भौतिकवाद के माता पिता हैं, जिसके ग्लैमर से आकर्षित होकर साधनहीन समुदाय अर्थात आमजन भी अपनी विपन्नताओं के बावज़ूद इसको मुख्य धारा समझ कर उसके आकर्षण में गिरफ़्तार होता जा रहा है । और फ़िर यही प्रवृत्ति आपराधिक प्रवृत्तियों को जन्म देती है । भौतिकवाद एक मकड़जाल है, जिसका पाश ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है ।

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